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chhattisgarh ke janjati vidroh छत्तीसगढ़ के जनजाति विद्रोह

Chhattisgarh ke janjati vidroh 
छत्तीसगढ़ के जनजाति विद्रोह 


     छत्तीसगढ़ के इतिहास में कई आदिवासी और जनजाति विद्रोह हुआ।  इसमें बस्तर के आदिवासी ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  अधिकांश जनजाति विद्रोह बस्तर में हुए।  इन विद्रोह का मूल कारण आदिवासियों के परम्पराओं और संस्कृति में मराठा शासन और अंग्रेजो ने हस्क्षेप किया।  इसकी हस्तक्षेप के विरोध में ये विद्रोह हुआ।  जिन में से प्रमुख विद्रोह इस प्रकार है - 

  • कोई विद्रोह  (Koi Vidroh)
  • मुरिया विद्रोह  (Muriya Vidroh)
  • महान भूमकाल का विद्रोह  (Bhoomkal vidroh)


छत्तीसगढ़ के जनजाति विद्रोह


कोई विद्रोह (Koi Vidroh) 1859


     सन 1859 में ब्रिटिश सरकार ने दक्षिण बस्तर में जंगल को काटने का ठेका हैदराबाद के व्यापारियों को दे दिया।  इस ठेकेदारी प्रथा के लेकर स्थानीय जमींदार और कोई आदिवासियों में असंतोष का वातावरण फ़ैल गया।  ठेकेदार मनमानी करने लगे। 



      पोतेकेला के जमींदार नागुल दोरला ने कोई आदिवासियों के साथ मिल विद्रोह कर दिया।  इस विद्रोह में रामभोई (भोपालपट्टनम के जमींदार) और जग्गा राजू (भेज्जी के जमींदार) ने कोई विद्रोह में साथ दिया।  नागुर दोरला के नेतृत्व में यह निर्णय लिया गया की भविष्य में बस्तर में साल वृक्ष को काटने नही दिया जायेगा।  "एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर" का नारा बुलंद कर दिया।  



     इस विद्रोह का सूचना पाकर अंग्रेजो ने बन्दुकधारी सिपाही भेज दिया।  कोई विद्रोहियों ने ठेकेदारों सहित सपहियों को खदेड़ दिया।  अंत में अंग्रेजो ने ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर दिया।  छत्तीसगढ़ के बस्तर में कोई विद्रोह को भारत में हुए चिपको आन्दोलन के सामान विद्रोह था।  



मुरिया विद्रोह (Muriya Vidroh) 1876



     अंग्रेजों ने अन्य देशी रियासतों के राजाओ सहित बस्तर के राजा भैरमदेव को प्रिंस ऑफ़ वेल्स के सम्मान में दिल्ली दरबार में उपस्थित होने के आदेश दिया।  बस्तर के राजा दिल्ली जाते हुए मारेंगा नामक स्थान में मुरिया आदिवासियों ने राजा को रोक लिया।   



     मुरिया आदिवासी दीवान गोपीनाथ और मुंशी आदिल प्रसाद के अत्याचार से परेशान थे।  मुरिया आदिवासियों के अंदेशा था की राजा के दिल्ली चले जाने पर दीवान और मुंशी का  आत्याचार बढ़ जायेगा।  मुरिया आदिवासी  राजा को वापस बस्तर लौट जाने का निवेदन किया।  



     सन 1876 में बस्तर रियासत के दीवान गोपीनाथ  और मुंशी आदिल प्रसाद  के शोषण और अंग्रेजो के दमन-चक्र के खिलाफ मुरिया आदिवासियों के विद्रोह को ही "मुरिया विद्रोह" कहते है। 


     बस्तर रियासत के दीवान गोपीनाथ ने शोषणकारी निति शुरू कर दिया। जिससे मुरिया आदिवासियों में विद्रोह की भावना उठने लगी।  मुरिया आदिवासियों ने झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया। मुरिया विद्रोहियों ने प्रतिक के रूप में आम वृक्ष की टहनी चुना।   


     मुरिया आदिवासियों के विद्रोहियों ने झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में बस्तर के राजधानी जगदलपुर के राजमहल में हमला कर दिया।  इससे मुक्ति पाने के लिए राजा ने ब्रिटिश अधिकारीयों से मदद मांगी।  ब्रिटिश प्रशासन ने मैक जार्ज के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना भेजी।  


     मैक जार्ज ने विद्रोहियों से विद्रोह का कारण पूछा।  विद्रोहियों ने दीवान गोपीनाथ और मुंशी आदिल प्रसाद के अत्याचार और शोषण की शिकायत की और उन्हें बस्तर से निष्काषित करने की मांग की।  


     मैक जार्ज ने 8 अप्रैल 1876 को विशेष मुरिया  दरबार का आयोजन कर दीवान गोपीनाथ और मुंशी आदिल प्रसाद को बस्तर रियासत से निष्काषित कर दिया।  मुरिया विद्रोहियों की जीत हुई। 




महान भूमकाल विद्रोह (Mahan Bhoomkal Vidroh) 1910 


     भूमकाल का अर्थ है - भूकंप या उलट-पुलट।  बस्तर रियासत में हुएं बहुत शक्तिशाली और बड़ा आंदोलन था इसलिए इसे "महान भूमकाल" का नाम दिया गया।  

     इस विद्रोह के कई कारण थे जिसमे प्रमुख कारण हैं -



  • रियासत के अधिकारी और ठेकेदार - 
               रियासत के अधिकारी और कर्मचारी आदिवासियों के साथ दूर-व्यव्हार करते थे।  आदिवासियों से अनुचित मांग करते थे। 
  • राजपरिवार का षड्यंत्र -
               बस्तर के राजा रूद्र प्रताप देव की सौतेली माँ रानी सुवर्ण कुंवर अपनी उपेक्षा से असंतुष्ट थी।  रानी सुवर्ण कुंवर और लाल कालिंद्र सिंह ने आंदोलन की जिम्मेदारी नेतनार के जमींदार  गुंडाधूर को सौपी।  
  • बैजनाथ पण्डा को दीवान बनाना -
           आदिवासी बैजनाथ पण्डा से नाराज थे क्योकि दीवान ने आरक्षित वन पद्धति को बढ़ावा दिया। 

  • ब्रिटिश हस्तक्षेप -
               बस्तर के आदिवासी बस्तर के राजा को ही अपना शासक मानते थे।  वो ब्रिटिश अधिकारीयों के बाहर से आये हुए मानते थे तथा ब्रिटिश के हस्तक्षेप से आदिवासी भड़क उठे और नारा दिया "बस्तर, बस्तरवालों का है" 


विद्रोह -

          पुसपाल बाज़ार की लूट के साथ भूमकाल विद्रोह शुरू हुआ।  विद्रोह की सुचना पाकर ब्रिटिश अधिकारियों ने गेयर और डिब्रे के नेतृत्व में सेना भेजी।  आदिवासी झुकने को तैयार नही थे।  आन्दोलन में खूब खून खराबा हुआ।  


परिणाम -

          विद्रोहियों को निर्ममता से मारा गया।  विद्रोह को कुचल दिया गया।   लाल कालिंद्र सिंह को नजरबंद कर दिया और रानी स्वर्ण कुंवर को निर्वासित कर दिया। 









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