फुल फॉर्म

सोनाखान विद्रोह (sonakhan vidroh Chhattisgarh )

सोनाखान विद्रोह (sonakhan vidroh Chhattisgarh )


छत्तीसगढ़ में सन 1857 के दौरान कई क्रांतिकारी गतिविधियाँ हुई जिसने अंग्रेजी हुकुमत के नाक में दम कर दिया था।  ब्रिटिश गवर्नर लार्ड कैनिंग के शासन के दौरान भारत वर्ष  में कई आंदोलन हुए।  जिसका प्रभाव भारत के सभी हिस्सों में हुआ।  छत्तीसगढ़ में भी सन 1857 की क्रान्ति का प्रभाव पड़ा।  वीर नारायण सिंह, सुरेन्द्र साय और हनुमान सिंह जैसे क्रांतिकारियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।










छत्तीसगढ़ में होने वाले भर्ती परीक्षा में सोनाखान विद्रोह से सम्बंधित प्रश्न पूछें जाते है, इस topic को पढकर आपको सोनाखान विद्रोह की पूरी जानकरी प्राप्त हो जाएगी।  इसे पढने पर आपको इससे सम्बंधित प्रश्न आपसे आसानी से बन जायेगा।

आइये जानते है की छत्तीसगढ़ में हुए प्रमुख क्रांतिकारी विद्रोह के बारे में -



सोनाखान के वीर नारायण सिंह का विद्रोह -


इसे सोनाखान का विद्रोह भी कहते है क्योकिं सन 1857 के समय हुआ एक महत्वपूर्ण विद्रोह था जिसने छत्तीसगढ़ के जनता के मन में क्रांति की भावना और अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह को नई दिशा दी। यही वो प्रथम घटना थी जिसने छत्तीसगढ के  आमजन में राष्ट्रीयता और देश भक्ति की भावना उत्पन्न किया। 


सोनाखान विद्रोह की पृष्ठ्भूमि -

सोनाखान के जमींदार वीर नारायण सिंह एक नेकदिल इंसान थे। वहां जनता के सुख दुःख में सहभागी होते थे।  इसलिए जनता में लोकप्रिय थे।  देवरी के जमींदार महाराज साय  उनकी लोकप्रियता से ईर्षा करते था। तभी     सोनाखान में 1856 में भयंकर अकाल पड़ा।  आकाल इतना था की लोगों के पास खाने के लिए अनाज नही था।  इस विकट परिस्थिति में नारायण सिंह ने अपना अन्न भंडार अकाल पीड़ितों को बाँट दिया।  अन्न कम पड़ा तो माखन बनिया जो एक व्यापारी था का गोदाम से अनाज गरीबों में बाँट दिया।  माखन व्यापारी ने चोरी और डकैती  का आरोप लगा कर रायपुर के डिप्टी कमिश्नर से कर दी। 24 अक्टूबर 1856 को रायपुर के  डिप्टी कमिश्नर ने वीर नारायण सिंह को संबलपुर से पकड़ कर रायपुर जेल में बंद कर दिया।


10 मई 1857 की सैनिक क्रांति 1857 का विद्रोह की अलख पुरे देश में फ़ैल गयीं थी।  यह विद्रोह की ललक रायपुर सेना भी भड़क उठी।  27 अगस्त 1857 को तीसरी देशी रेजिमेंट के सैनिकों की मदद से वीर नारायण सिंह जेल से सुरंग बनाकर फरार हो गया।  वीर नारायण सिंह सोनाखान पहुँच कर 500 सैनिकों का दल गठित किया। जिसका उद्देश्य अंग्रेजी सेना को सोनाखान से खदेड़ना था। 


वीरनारायण सिंह और अंग्रेज -

वीरनारायण सिंह के जेल से फरार होने पर रायपुर डिप्टी कमिश्नर ने स्मिथ के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना को सोनाखान भेज दिया। कैप्टन  स्मिथ की सेना की सहायता देवरी  के जमींदार महराज साय ने किया।  महराज साय का वीर नायायण सिंह के साथ खानदानी दुश्मनी था।  इसी का बदला लेने के लिए महराज साय ने अंग्रेजों की मदद की।  सोनाखान के समीप एक नाले के पास  स्मिथ की सेना और वीर नारायण सिंह की सेना का  भिडंत हुआ।  शुरुवात में अंग्रेज पिछड़ने लगे लेकिन बाहरी मदद से वहां संभल गया।  अग्रेजों ने सोनाखान के खाली बस्ती में आग लगा दी।  सोनाखान जल गया।  स्मिथ ने पहाड़ी के चारों ओर से वीर नारायण सिंह को घेर लिया।  भारी गोली भारी हुई।  अंत में वीर नारायण सिंह पकड़ा गया और फिर से रायपुर जेल में बंद कर दिया गया।


वीर नारायण सिंह को फांसी -

जेल में बंद वीर नारायण सिंह पर देश द्रोह का मुकदमा चला।  कोर्ट ने वीर नारायण सिंह को फासी की सजा सुनाई।  10 दिसम्बर 1857 को वीर नायारण को रायपुर के जय स्तम्भ चौक पर प्राणदण्ड (फ़ासी) दे दिया गया।  रायपुर के जय स्तम्भ चौक आज भी वीर शहीद नारायण सिंह की बलिदान का गुणगान करती है।  भारत के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नायारण सिंह थे।


वीर नारायण सिंह के पुत्र गोविन्द सिंह को भी अंग्रेजो ने गिरफ्तार कर लिया गया। गोविन्द सिंह को नागपुर जेल में कैद कर लिया।  गोविन्द सिंह को 1860 में रिहा कर दिया।  सोनाखान में महाराज साय ने कब्जा कर लिया था क्योकि अंग्रेजों की मदद वीर नारायण सिंह को पकड़ने के बदले सोनाखान की जमींदारी दे दी थी। गोविन्द सिंह ने महराज साय की हत्या कर दी।



महत्वपूर्ण बिन्दु -


सोनाखान के विद्रोह के समय नागपुर में ब्रिटिश कमिश्नर मि. पलाउडन थे।
रायपुर में डिप्टी कमिश्नर चार्ल्स सी. एलियट थे।
विद्रोह को दबाने वाले पुलिस आधिकारी कप्तान स्मिथ था।

सोनाखान वर्तमान में छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिला के अंतर्गत आता है।  शहीद वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति के थे।  इस प्रकार छत्तीसगढ के प्रथम शहीद स्वतंत्रता सग्राम के एक आदिवासी था। 



सुरेन्द्र साय का विद्रोह - 

संबलपुर के सुरेन्द्र साय उत्तराधिकार युद्ध के कारण हजारीबाग जेल में बंद थे।  जेल से फरार होकर सोनाखान विद्रोह के समय अंग्रेजों से लोहा लेने संबलपुर के जमींदार सुरेन्द्र साय रायपुर आ गये।  सुरेन्द्र साय ने वीर नारायण सिंह के पुत्र गोविन्द सिंह के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरूद्ध छापामार युद्ध छेड़ दिया।  अंग्रेजों की रातों की नींद गायब हो गया।  दोनों को पकड़ने के लिए षड्यंत्र किया और सुरेन्द्र साय को उनके साथियों के साथ  गिरफ्तार कर आसीरगढ़ किले में बंद कर दिया।  जहाँ सुरेन्द्र से को यातनाएं दी गयी।  28 फरवरी 1884 को असीरगढ़ में सुरेन्द्र साय की मृत्यु हो गयी। 





छत्तीसगढ़ के इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलनों से सम्बंधित जानकारी के लिए हमारे वेबसाइट www.navkrihelp.com को नियमित रूप से visit करते रहे।

इसी तरह की महत्वपूर्ण जानकारी और सरकारी नौकरी के बारे में जानने के लिए हमारे Whatsapp Group जॉइन करे  Click Here Whatsapp Group 


छत्तीसगढ में हुए जनजाति विद्रोह के लिए Click Here
छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन के लिए Click Here
छत्तीसगढ़ के कलचुरी वंश  के लिए Click Here
छत्तीसगढ़ के मराठा शासन के लिए Click Here
➥ छत्तीसगढ़ के नये जिले के लिए  Click Here



Post a Comment

0 Comments

close